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तेरा मन




तन से अच्छा तेरा मन है
बरस रही ऋतु तू सावन है ।
सजदा करने का मन करता
ऑखे तेरी सुन्दर वन है ।।

चन्दन जैसी देह तुम्हारी 
महक रही हो बन फुलवारी ।
गौर वर्ण है निर्मल मन है
मेरी  हो तू राजदुलारी ।।

नही दिखाती कपट किनारी
है घमंड को जैसे मारी ।
सरस सरल सौम्यता विखेरे
ऋजुता तो चल गयी उधारी ।।


डॉ दीनानाथ मिश्र


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2 Comments

Renu

30-Mar-2023 09:12 PM

👍👍💐

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बहुत सुन्दर

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